कुमार सुशांतः ना जइयो परदेस
संजय साव की उम्र 32 साल है. वह बिहार के गोपालगंज का रहने वाला है. गांव में रहकर वह इतना नहीं कमा पाता कि अपने परिवार के भोजन और अन्य ज़रूरतों को पूरा कर सके. दिक्कतों को झेलते-झेलते परेशान होकर वह कमाने के लिए बाहर जाने का फैसला करता है, ताकि अपने घर कुछ पैसा भेज सके और बच्चों को कम से कम दो व़क्त की रोटी नसीब हो. संजय नोएडा में ममूरा इलाक़े में रहने वाले अपने दोस्त के पास आता है, जो सेक्टर 67 की एक एक्सपोर्ट कंपनी में काम करता है. संजय भी उसी कंपनी में अपने दोस्त के साथ काम में लग जाता है. कढ़ाई-बुनाई के काम में लगे संजय को हर दिन महज़ 125-150 रुपये मिलते हैं. शुरू में कुछ महीनों तक संजय अपने घर पैसा भेजता है, पर दोस्तों की ग़लत संगत में पड़कर उसकी आदतें बिगड़ने लगती हैं और वह अपने घर पैसा भेजना बंद कर देता है. संजय दिन भर काम करता है और शाम को दोस्तों के साथ शराब पीता है, जुआ खेलता है. ये सारी बातें वह ख़ुद शराब के नशे में बताता है, नशे में धुत संजय अश्लील बातें करता है और अपनी बीवी के साथ फोन पर अभद्रता करता है. यह हालत केवल संजय की नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार एवं पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के उन लाखों युवाओं की है, जो काम की तलाश में दिल्ली और नोएडा जैसे महानगरों में आते हैं, लेकिन घर-परिवार से दूर दोस्तों की ग़लत संगत में फंसकर ख़ुद को बर्बाद कर लेते हैं.
पिछले साल 25 दिसंबर को दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अपने एक बयान में कहा था कि आज़ादी के व़क्त दिल्ली की आबादी चौदह लाख थी, लेकिन आज वह 1.6 करोड़ से ज़्यादा हो गई है. यह आंकड़ा पिछले साल का था यानी आज दिल्ली की आबादी 2 करोड़ के आसपास होगी. मुख्यमंत्री का बयान किसी भी मुद्दे पर हो, लेकिन आंकड़ों से साफ है कि आज भी लोग बेरोज़गारीवश कितनी तेज़ी से दिल्ली जैसे बड़ों शहरों की ओर रुख़ कर रहे हैं.
नोएडा के आसपास स्थित खोड़ा, ममूरा एवं झुंडपुरा आदि इलाक़ों में रहने वाले इन कामगारों का जीवन बसर करने का तरीक़ा बेहद चौंकाने वाला है. एक कतार में बने दर्ज़नों कमरे. हर कमरा बमुश्किल 10 गुणा 10 का. हर कमरे में 4-6 लोग. यह संख्या ज़्यादा भी हो सकती है. ऐसा इसलिए, ताकि कम किराया देना पड़े. कमरे की हालत ऐसी कि आप दो मिनट के लिए भी अंदर जाएं तो सांस लेने में भी तकलीफ होने लगे. कमरे के बाहर गंदगी का अंबार. मुहल्ले में न कोई सड़क, न कोई स़फाई व्यवस्था. उत्तर प्रदेश के इटावा ज़िले का निवासी 36 वर्षीय अजीत बताता है कि हम लोगों की कंपनी पास ही स्थित है, इसलिए हम और अधिकांश कामगार इस इलाक़े में रहते हैं. अजीत के मुताबिक़, वह हर महीने चार-साढ़े चार हज़ार रुपये कमाता है, जबकि कमरे का किराया प्रति माह दो हज़ार रुपया है. इसलिए वह चार-पांच दोस्तों के साथ रहता है और उसे बतौर किराया हर महीने केवल 450- 500 रुपये देने पड़ते हैं. ऐसे परिवेश में मन लगने के सवाल पर वह बताता है कि शुरू-शुरू में दिक्कतें आती हैं, फिर लोग अभ्यस्त हो जाते हैं. अजीत एवं उसके दोस्तों की दिनचर्या भी काफी चौंकाने वाली है. वे सुबह आठ बजे सोकर उठते हैं. मिलजुल कर खाना पकाने की तैयारी में जुट जाते हैं. न हरी सब्जी की चिंता, न सही से खाना पकाने की. बस कुछ भी बन जाए, मगर जल्दी. खाना खाकर वे सब काम पर निकल जाते हैं और देर शाम लौटने पर समूह का कोई एक सदस्य सब लोगों को पार्टी देता है यानी शराब पिलाता है. हर दिन किसी एक की बारी. पैसा पर्याप्त है तो शराब बगल के ठेके से किसी अच्छे ब्रांड की, नहीं तो देशी शराब भी बड़े चाव से पी ली जाती है. न जान की चिंता, न पीने के साथ कुछ खाने की चाह. हैरानी की बात यह है कि शराब पीने के बाद कोई जुआ खेलने चला जाता है, कोई शारीरिक सुख के लिए सेक्स वर्करों की गली की ओर रुख़ करता है तो कोई ममूरा स्थित एसबेस्टस छत वाले एक छोटे से सिनेमाघर में चोरी-छिपे दिखाई जाने वाली ब्लू फिल्म देखने चला जाता है.
सेक्टर 63 में बुनाई करने वाली एक कंपनी में काम करने वाला अनवारुल कहता है कि यहां बहुत गड़बड़ है. वह बताता है कि उसकी कंपनी में कई महिलाएं काम करती हैं, जिनमें कुछ शादीशुदा हैं और कुछ कुंवारी. अनवारुल से बातचीत के बीच ही उसका दोस्त तपाक से बताता है कि उन महिलाओं-लड़कियों की आर्थिक स्थिति डावांडोल है, इसलिए वे मजबूरीवश इन कंपनियों में काम करती हैं. अनवारुल की मानें तो आर्थिक तंगी के चलते और अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए ये महिलाएं-युवतियां अपने साथी कर्मचारियों के साथ संबंध भी बना लेती हैं. चूंकि पुरुष कामगार काफी दिनों से घर से बाहर होते हैं, इसीलिए वे भी आसानी से इनके चंगुल में फंस जाते हैं. अनवारुल इस इलाक़े में जुआ खिलवाने वाले एक गिरोह के बारे में भी बताता है. वह कहता है कि पुलिस की नज़रों से कथित तौर पर बचते हुए इस गिरोह के कुछ सदस्य ममूरा के सेक्टर 63 वाले बड़े पार्क में ठेला लगाते हैं, जहां से रोज हज़ारों कामगार गुज़रते हैं. गिरोह के सदस्य पहले तो प्रलोभन देकर कुछ लोगों को जुए में जिताते हैं और जब भीड़ जुट जाती है, लोग खेलने लगते हैं तो जुआ कई-कई घंटे जारी रहता है और लोगों से तब तक जबरन खिलवाया जाता है, उनके सारे पैसे ख़त्म न हो जाएं. सूत्र बताते हैं कि इस गिरोह के पीछे बहुजन समाज पार्टी के एक बड़े स्थानीय नेता का हाथ है. इसीलिए गिरोह के सदस्य इलाक़े में अलग-अलग अड्डों पर बिना किसी ख़ौ़फ के ऐसी हरकतों को अंजाम देते हैं. दरअसल, इन प्रवासी कामगारों को एक अन्य सक्रिय गिरोह पथभ्रष्ट कर रहा है. वह इन्हें जुआखाने तक ले जाता है, सेक्स वर्करों की गली का रास्ता बताता है और छोटे से सिनेमाघर में हिंदी फिल्मों की आड़ में ब्लू फिल्में दिखाकर अनाप-शनाप पैसे ऐंठता है.
पिछले साल 25 दिसंबर को दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने अपने एक बयान में कहा था कि आज़ादी के व़क्त दिल्ली की आबादी चौदह लाख थी, लेकिन आज वह 1.6 करोड़ से ज़्यादा हो गई है. यह आंकड़ा पिछले साल का था यानी आज दिल्ली की आबादी 2 करोड़ के आसपास होगी. मुख्यमंत्री का बयान किसी भी मुद्दे पर हो, लेकिन आंकड़ों से साफ है कि आज भी लोग बेरोज़गारीवश कितनी तेज़ी से दिल्ली जैसे बड़ों शहरों की ओर रुख़ कर रहे हैं. घर की मजबूरी और बीवी-बच्चों की बेहतरी की उम्मीद लिए वे आते हैं कमाने, मगर कुसंगत और गंदे परिवेश में फंसकर सब कुछ भूल जाते हैं. उन्हें अच्छा लगता है तो बस शराब, शबाब और उनके दोस्त. उनकी नींद तब खुलती है, जब सब कुछ लुट गया होता है.
आंकड़ों पर एक नज़र
एक सर्वे के मुताबिक़, नोएडा में तक़रीबन 12,093 लघु एवं मध्यम उद्योग संचालित हो रहे हैं. इनमें ज़्यादातर उद्योग एक्सपोर्ट, लेदर, कोरोगेटेग एवं इंजीनियरिंग आदि से संबंधित हैं. इन उद्योगों के तक़रीबन 8,000 से अधिक कामगार यहां के आसपास के इलाक़ों में रहते हैं. काम की तलाश में हर साल क़रीब 1,500 से 2,000 लोग नोएडा आते हैं, वहीं ग़लत आदतों में फंसकर और असफल होकर क़रीब 500-700 लोग हर साल अपने शहर लौट जाते हैं. गंदगी में रहने, खानपान में कमी और ग़लत आदतों के कारण हर साल तक़रीबन 50-65 कामगार गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. 2001 में नोएडा की आबादी क़रीब 5 लाख थी, लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक़, नोएडा में जिस हिसाब से बाहरी लोग आ रहे हैं, उससे 2011 तक नोएडा की आबादी दोगुनी यानी 12 लाख तक हो जाएगी. जानकारी के मुताबिक़, नोएडा स्थित उद्योगों पर काम का दबाव काफी ज़्यादा होने के कारण यहां बेरोज़गारों को आसानी से रोज़गार मिल जाता है. आंकड़ों के अनुसार, एक्सपोर्ट कंपनियों में 35 से 40 फीसदी कामगारों की हमेशा ज़रूरत होती है. प्लास्टिक एवं लेदर उद्योगों में 40 से 45 फीसदी, कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में 50 फीसदी और इंजीनियरिंग उद्योग में 50 से 55 फीसदी काम करने वालों की जगह अक्सर खाली रहती है. यही वजह है कि आप इन कंपनियों के बाहर वर्करों की आवश्यकता है वाला बोर्ड आसानी से देख सकते हैं. कामगारों को इन कंपनियों में प्रतिदिन 8-10 घंटे काम करना पड़ता है. ज़्यादा समय तक काम करने वालों को उनकी मेहनत के अनुसार ओवरटाइम भी मिलता है.
कुमार सुशांतः ना जइयो परदेस
Reviewed by kumar sushant
on
8:53 PM
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