कुमार सुशांतः विश्व कप और टीम इंडिया
राजनीति का असर है कि टीम में खिलाड़ियों के प्रदर्शन से ज़्यादा इस बात पर नज़र रखी जाती है कि कौन खिलाड़ी किस खेमे से हैं. बोर्ड के गठन के शुरुआती साल से ही इसकी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं. दरअसल, बीसीसीआई को पता है कि विश्वकप क्रिकेट का मतलब है बहुत सारा पैसा. बड़े पैसे का मतलब है बड़ी राजनीति. ऐसे में जिस तरह आईपीएल घोटाला सामने आया, उसी तरह बीसीसीआई को और भी बहुत सारे मामलों पर जवाब देना है.
किसी भी टीम के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है विपक्षी टीम के जल्द से जल्द 10 विकेट झटकना. इसके लिए ज़रूरी है कि आपके पास बेहतरीन तेज़ गेंदबाज़ हों. ऐसे तेज़ गेंदबाज़, जो न केवल गेंद को स्विंग कराने में सक्षम हों, बल्कि गेंदबाज़ी के अनुकूल पिच न होने के बावजूद बल्लेबाज़ों को तेज़ गेंद की धार से परेशान कर सकें. पाकिस्तान के शोएब अख्तर, ऑस्ट्रेलिया के मिशेल जॉनसन, श्रीलंका के लसिथ मलिंगा जैसे धुरंधर गेंदबाज़ अपनी इसी आक्रामकता की वजह से अपनी टीम को कई बार बचाने में सफल साबित होते रहे हैं. कहने का मतलब यह कि शुरुआती खेल में विपक्षी टीम के बल्लेबाज़ों पर अटैक के बाद इन तेज़ गेंदबाज़ों के कुछ ओवर अंतिम खेल के लिए बचाकर रखे जाते हैं, ताकि आख़िर में बल्लेबाज़ों को परेशान किया जा सके. रिकॉड्र्स पर नज़र डालें तो टीम इंडिया इसी बिन्दु पर अक्सर कमज़ोर पड़ जाती है. इसी का नतीज़ा था कि दक्षिण अफ्रीका के ख़िला़फ सेंचुरियन टेस्ट मैच में भारतीय बल्लेबाज़, मोरने मोर्केल और डेल स्टेल जैसे अफ्रीकी तेज़ गेंदबाज़ों से सामने 136 रनों पर ही सिमट गए. हालांकि, पिछले चार सालों में आरपी सिंह, एस श्रीसंत, इशांत शर्मा और इरफान पठान जैसे कुछ गेंदबाज़ों ने भारतीय टीम के लिए एक उम्मीद की किरण जगाई है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इरफान पठान को विश्पकप टीम में कोई जगह नहीं मिली. क्या हम स्पिनर की मदद से केवल रन रोकने में सक्षम हो पाएंगे, वह भी तब, जब सेंचुरियन टेस्ट में हरभजन सिंह जैसा स्पिनर 2 विकेट पर 169 रन देकर सबसे महंगा साबित होता है.
टीम इंडिया की बल्लेबाज़ी के लिए सबसे बड़ा परेशानी का सबब है पिच की रुपरेखा. फ्लैट पिच पर तो टीम इंडिया का बैटिंग ऑर्डर ठीक रहता है, लेकिन फास्ट पिच मिलते ही या गेंद थोड़ा स्विंग होते ही भारतीय पारी लड़खड़ाने लगती है. ऐसे में अक्सर वॉल ऑफ द क्रिकेट कहे जाने वाले राहुल द्रविड़ जैसे बल्लेबाज़ों की ज़रूरत होती है, जो
धीरे-धीरे ही सही, लेकिन टीम की डूबती नैय्या को बचाए. लेकिन बीसीसीआई ने द्रविड़ को भी शामिल नहीं किया. जबकि द्रविड़ के विश्वकप रिकॉड्र्स पर नज़र डालें तो 1999 में हुए विश्व कप में राहुल द्रविड़ सबसे अधिक रन बनाने वाले बल्लेबाज़ थे. द्रविड़ ही एक ऐसे बल्लेबाज़ थे, जिन्होंने विश्व कप मैच में लगातार दो शतक बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम किया है. उन्होंने केन्या के ख़िला़फ 110 रन और श्रीलंका के ख़िला़फ टोंटन में 145 रनों की धुआंधार पारी खेलकर मैच के रुख़ को कई बार बदला. 2003 के विश्वकप में द्रविड़ भारतीय टीम में बतौर उपकप्तान रहे. इसमें भारत विश्वकप के फाइनल मैच में पहुंचा था.
वैसे स्विंग होने वाली पिच पर टीम इंडिया के बिखरने के पीछे भी ज़िम्मेदार कोई और नहीं, बीसीसीआई है. बोर्ड ने भारत में ऐसी पिच बनाने और भारतीय टीम को उसपर अभ्यास कराने का मौक़ा ही नहीं दिया.
भारतीय टीम में संभावित 30 खिलाड़ियों की सूची में महेंद्र सिंह धोनी के अलावा तीन और खिलाड़ियों को विकेट कीपर के नाम पर शामिल किया गया है. इन खिलाड़ियों में धोनी के अलावा पार्थिव पटेल, दिनेश कार्तिक और रिद्धिमान साहा शामिल हैं. सवाल उठना लाज़मी है कि टीम में एक साथ चार विकेट कीपर को शामिल करने की क्या ज़रूरत थी. किसी भी टीम की सफलता उसकी बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और फील्डिंग पर निर्भर होती है. बोर्ड को विकेट कीपिंग के लिए चार विकल्प रखने से अच्छा था कि बल्लेबाज़ी और गेंदबाज़ी को ज़्यादा महत्व देते हुए दो और संभावित खिलाड़ियों को शामिल करना चाहिए था. कम से कम इस आधार पर राहुल द्रविड़ टीम में आ जाते.
टीम में फिटनेस को लेकर अगर कुछ खिलाड़ियों का चयन हुआ है, तो यह भी बिल्कुल निराधार है, क्योंकि फिटनेस के आधार पर तो कई भारतीय क्रिकेटर टांय- टांय फिस्स हो जाते हैं. इसी साल भारतीय कोच गैरी कर्स्टन ने युवराज सिंह, ज़हीर ख़ान और रोहित शर्मा जैसे खिलाड़ियों की फिटनेस पर भी सवाल उठाए थे. इसके अलावा आशीष नेहरा और रविंद्र जडेजा कीफिटनेस पर भी सवाल उठे थे. कर्स्टन ने कहा था कि 42 की उम्र में भी वह कई भारतीयों खिलाड़ियों से ज़्यादा फिट हैं. ऐसे में फिटनेस और रिकॉर्ड के आधार पर अगर चयन नहीं हुआ तो फिर चयन-प्रक्रिया का आधार क्या था. इसमें कोई संदेह नहीं कि बोर्ड हमेशा से राजनीति का अखाड़ा रहा है. इसी राजनीति का असर है कि टीम में खिलाड़ियों के प्रदर्शन से ज़्यादा इस बात पर नज़र रखी जाती है कि कौन खिलाड़ी किस खेमे से हैं. बोर्ड के गठन के शुरुआती साल से ही इसकी चयन प्रक्रिया पर सवाल उठते रहे हैं. दरअसल, बीसीसीआई को पता है कि विश्वकप क्रिकेट का मतलब है बहुत सारा पैसा. बड़े पैसे का मतलब है बड़ी राजनीति. ऐसे में जिस तरह आईपीएल घोटाला सामने आया, उसी तरह बीसीसीआई को और भी बहुत सारे मामलों पर जवाब देना है. ऐसे में टीम इंडिया और विश्वकप से स़िर्फ उम्मीदें ही लगाई जा सकती हैं.
कुमार सुशांतः विश्व कप और टीम इंडिया
Reviewed by kumar sushant
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8:47 PM
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