कुमार सुशांतः विक्रमशिला को सबने छला
अंग प्रदेश की धरती पर स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय भले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध रहा हो, लेकिन इसके साथ शुरू से ही सौतेला व्यवहार हो रहा है. इसके लिए स़िर्फ वर्तमान नीतीश सरकार ही नहीं, बल्कि वे तमाम राजनीतिक दल भी दोषी हैं, जिन्होंने लंबे समय तक बिहार में शासन किया.विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना वर्ष 775 से 800 के बीच पालवंश के राजा धर्मपाल ने भागलपुर से 50 किलोमीटर दूर अंतिचक गांव के समीप की थी. यहां से शिक्षित कई छात्रों ने विदेशों में भी बिहार और विक्रमशिला विश्वविद्यालय का मान बढ़ाया. यही नहीं, विश्वविद्यालय के विद्वान प्रोफेसरों ने तिब्बत जाकर भारत के कई ग्रंथों का तिब्बती भाषा में अनुवाद किया. तिब्बती विद्वानों ने भी यहां के छात्रों की मेधा का लोहा माना और अध्ययन के लिए वे विक्रमशिला आने लगे. बाहर से आने वाले अतिथियों के लिए विश्वविद्यालय में अलग से अतिथिशाला हुआ करती थी. यहां व्याकरण, न्याय, दर्शन और तंत्र की विशेष तौर पर पढ़ाई होती थी. जो छात्र अपनी शिक्षा पूरी करते थे, उन्हें बंगाल के शासक उपाधियों से नवाज़ते थे. पूर्व मध्य युग में कोई भी शिक्षा केंद्र इतना मशहूर नहीं हुआ, जितना विक्रमशिला विश्वविद्यालय. नतीजतन, 12वीं शताब्दी में विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या क़रीब 3,000 तक हो गई थी. विक्रमशिला के विद्वानों में से सबसे प्रसिद्ध दीपांकर श्रीज्ञान थे, जो उपाध्याय अतीश के नाम से विख्यात हैं. लेकिन वर्ष 1203 विश्वविद्यालय के लिए अशुभ साबित हुआ. गुलाम शासकों के सेनापति बख्तियार खिलजी ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय को किला समझ कर नष्ट कर दिया. तबसे यह पुनरुद्धार की बाट जोह रहा है. विक्रमशिला विश्वविद्यालय जैसी ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने और विकास के मक़सद से 2005 के विधानसभा चुनाव में कहलगांव की जनता ने जदयू नेता अजय मंडल को मौक़ा देकर चुनाव जिताया. बगल के ही भागलपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा नेता अश्विनी चौबे ने जीत की हैट्रिक मारी. भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी 2004 में भागलपुर से लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे. हालांकि उपमुख्यमंत्री बनने पर उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी. इसके बाद 2006 में भाजपा नेता सैयद शाहनवाज हुसैन यहां से सांसद बने. लेकिन विक्रमशिला जैसी ऐतिहासिक धरोहर को बचाने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया गया. आज तक न तो अजय मंडल ने विधानसभा में विक्रमशिला विश्वविद्यालय मामले को उठाया, न अश्विनी चौबे ने और न तो उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने. सांसद शाहनवाज़ हुसैन ने विक्रमशिला का मामला लोकसभा में उठाया ज़रूर, लेकिन वह केवल मीडिया में ही सिमट कर रह गया.
नीतीश सरकार ने जनता को बार-बार यह भरोसा दिलाया कि विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों का पुनरुद्धार शीघ्र ही किया जाएगा, लेकिन लोगों की उम्मीदों पर पानी तब फिर गया, जब नालंदा में काम शुरू हो गया और विक्रमशिला पर स़िर्फ घोषणाओं का दौर चलता रहा. नालंदा विश्वविद्यालय में पुनरुद्धार कार्य इसीलिए भी शुरू हुआ, क्योंकि वह नीतीश कुमार का चुनावी क्षेत्र रहा है. नालंदा अंतर्गत हरनौत विधानसभा क्षेत्र से वह चुनाव लड़ते रहे हैं. भागलपुर के पूर्व सांसद सुबोध राय बताते हैं कि विक्रमशिला मसले पर केंद्र की यूपीए सरकार पूरी तरह ज़िम्मेदार है. उनके मुताबिक़, नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार कार्य शुरू कराने के लिए नीतीश सरकार बधाई की पात्र है, लेकिन विक्रमशिला को लेकर उसका रवैया अफसोस जताने लायक़ है. वह पुरातत्व विभाग पर आरोप लगाते हुए कहते हैं कि आख़िर विक्रमशिला मुद्दे पर विभाग इतना ढीला क्यों है?
ऐसा नहीं है कि विक्रमशिला विश्वविद्यालय को केवल नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने ही ठगा. लंबे समय तक कांग्रेस ने बिहार में शासन किया, कई बार ग़ैर कांग्रेसी सरकारें भी सत्ता में आईं, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने 15 वर्षों तक शासन किया. इस दौरान कई बार विक्रमशिला का मामला जोर-शोर से उठा, वायदे किए गए, घोषणाएं भी हुईं, लेकिन हक़ीक़त में कुछ नहीं हो सका. यही नहीं, कहलगांव से विधायक एवं विधानसभा अध्यक्ष सदानंद सिंह ने भी कभी विक्रमशिला का मामला नहीं उठाया. परिणामस्वरूप सदानंद सिंह जहां सांसद बनने के सपने देखते थे, वहीं 2005 विधानसभा चुनाव में कहलगांव सीट भी हार गए. पटना उच्च न्यायालय के वकील एवं समाजसेवी पुरुषोत्तम सिंह बताते हैं कि पुरातत्व विभाग ने पहले भी विक्रमशिला की कई बार खुदाई कराई, लेकिन लापरवाहीवश खुदाई में प्राप्त बहुमूल्य चीजें सुरक्षित नहीं रह पाईं. पुरुषोत्तम सिंह की मानें तो भागलपुर और कहलगांव से जितने भी प्रतिनिधि निर्वाचित हुए, सबने विश्व धरोहर विक्रमशिला के नाम पर अपना उल्लू ही सीधा किया.
दरअसल, राज्य के सभी दल इस मामले में कभी केंद्र को दोषी ठहराते हैं तो कभी पुरातत्व विभाग को. वह फंडिंग को लेकर बयानबाज़ी करके बच निकलते हैं. लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं को यह पता होना चाहिए कि अगर इस ऐतिहासिक धरोहर का पुनरुद्धार किया जाए तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का पर्यटन स्थल बन सकती है, जिससे हर साल करोड़ों रुपये का फायदा हो सकता है. नेता इस बात से भी बेपरवाह हैं कि यहां जब-जब जनता को जिसने ठगा, जनता ने उसका तख्ता पलट कर रख दिया.
विक्रमशिला मसले पर केंद्र पूरी तरह ज़िम्मेदार है. नालंदा विश्वविद्यालय का काम शुरू होने पर नीतीश सरकार बधाई की पात्र है, लेकिन विक्रमशिला को लेकर रवैया अफसोस जताने लायक़ है.
- सुबोध राय, पूर्व सासंद
भागलपुर और कहलगांव से जितने भी प्रत्याशी निर्वाचित हुए, सबने विक्रमशिला के नाम पर अपना उल्लू सीधा किया.
- पुरूषोत्तम सिंह, वकील एवं समाजसेवी
कुमार सुशांतः विक्रमशिला को सबने छला
Reviewed by kumar sushant
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10:51 PM
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