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ये ब्लॉग कुमार सुशांत के लेख पर आधारित है।

कुमार सुशांत- कुष्ठ रोगी : कोई हमारी भी सुनो


राजेश्वर की उम्र 55 साल है. उसके तीन बेटे हैं और एक बेटी. राजेश्वर की आर्थिक हालत काफी दयनीय है. थोड़ी-बहुत सरकारी सहायता मिलती है, बाक़ी वह भीख मांगकर परिवार का गुज़ारा करता है, लेकिन लोग उसे भीख देने के लिए भी हाथ आगे नहीं बढ़ाते, क्योंकि उसे कुष्ठ है. राजेश्वर दिल्ली के आर के पुरम स्थित जीवनदीप कुष्ठ आश्रम में रहता है. यही हालत आश्रम में रहने वाले हर परिवार की है. ये लोग अनपढ़ हैं, लाचार हैं. राजेश्वर का कहना है कि हम लोग सरकार से केवल इतना चाहते हैं कि वह हमारे लिए स़िर्फ दो व़क्त की रोटी का बंदोबस्त कर दे, सही ढंग से इलाज करा दे. राजेश्वर के आसपास क़रीब दस-बारह की संख्या में अन्य कुष्ठ रोगी भी बैठे थे. उनमें से हुसैन नामक एक कुष्ठ रोगी अचानक फूट-फूटकर रोने लगता है. वह कहता है कि हम इतने बदनसीब हैं कि कोई हमें भीख देने के लिए भी हाथ आगे नहीं बढ़ाता, अगर सरकार मुंह मोड़ लेगी तो हम कहां जाएंगे.
जीवनदीप कुष्ठ आश्रम में क़रीब 80 परिवार रहते हैं. इन परिवारों में बच्चे और बड़े समेत लगभग 210 सदस्य हैं. हमने आश्रम की एक महिला से बातचीत करनी चाही तो उसने कहा कि मेरा बच्चा सुबह से भूखा है.
पहले कुछ खाने को लाओ, फिर बात करेंगे. हमने ऐसा किया. इसके बाद उसने बताया कि कुछ सरकारी सहायता तो ज़रूर मिलती है, लेकिन वह परिवार के भरण-पोषण के लिए नाकाफी है.
महिला बताती है कि यहां के 80 परिवारों में से केवल 25 परिवारों को ही सरकार ने पंजीकृत किया है, जिन्हें हर महीने 1800 रुपये मिलते हैं. महिला के पति बताते हैं कि हम पिछले 10 सालों से शेष परिवारों को भी पेंशन देने की मांग कर रहे हैं, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई.
आश्रम के बीच में एक बड़ा सा साई मंदिर है, जहां बाहर से भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए आते हैं. मंदिर के पास बैठे एक बुजुर्ग कुष्ठ रोगी अवध किशोर पाल से भी हमने बात की. वह बताते हैं कि कभीकभार बड़े बाबू लोग इस मंदिर में पूजा करने और हमें खाना बांटने आते हैं, उस दिन का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहता है और हम उस दिन जी भरकर खाते हैं.
अवध किशोर कहते हैं कि सरकार की ओर से हर परिवार को हर पंद्रह दिन में राशन मिलता है, लेकिन खाने वाले लोग ज़्यादा हैं, इसलिए मजबूरन सड़क पर भीख मांगनी पड़ती है. बच्चों के बारे में पूछने पर उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं. वह कहते हैं कि उनके 20 वर्षीय बेटे को कोई नौकरी नहीं देता. बेटे को कुष्ठ भी नहीं है, लेकिन नौकरी लग जाने के बाद जब यह जानकारी मिलती है कि वह कुष्ठ आश्रम में रहता है तो कंपनी वाले उसे निकाल देते हैं.
चिकित्सा संबंधी सरकारी सहायता के सवाल पर एक युवक कुष्ठ रोगी कहता है कि सरकारी डॉक्टर हर शुक्रवार को जांच के लिए आश्रम आते हैं. वे मरहम-पट्टी करते हैं, दवाइयां भी देते हैं, लेकिन बड़े इलाज और महंगी दवाओं के लिए सरकारी डॉक्टर बड़े अस्पतालों का पता बता देते हैं. युवक बताता है कि उसके पिता को आंख में तकलीफ थी. डॉक्टर ने ऑपरेशन बताया. वह विभिन्न सरकारी अस्पतालों में इधर से उधर भटकता रहा. आख़िर में कुछ समाजसेवियों की सहायता से उनका एक निजी अस्पताल में इलाज हुआ. युवक कहता है कि उसके इलाज न हो पाने की वजह से दो भाइयों की मौत हो गई. जीवनदीप आश्रम में रहने वाले कुष्ठ रोगी एक मामले में ख़ुशनसीब हैं कि उनके पास छत है. भारत में जहां एक ओर कुष्ठ रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं सरकार की बेरुख़ी की वजह से हज़ारों कुष्ठ रोगियों को रहने के लिए जगह तक नसीब नहीं है. ऐसे में इनकी अव्यवस्थित बस्तियों की संख्या दिनोंदिन बढ़ रही है. भारत पिछले बीस सालों में कुष्ठ रोगियों की संख्या में लगाम लगाने में सफल रहा है. एक अनुमान के मुताबिक़, भारत में कुष्ठ रोगियों की संख्या में 95 फीसदी की कमी आई है. यानी बीस साल पहले जहां भारत में यह संख्या 14 लाख थी, वहीं अब यह डेढ़ लाख के क़रीब है. इसके बावजूद दुनिया के नए कुष्ठ रोगियों में 54 फीसदी कुष्ठ रोगी अभी भी भारत के हैं. भारत में कुष्ठ रोगियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां उन्हें एवं उनके परिवारीजनों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है. यही वजह है कि वे शहर में या शहर से बाहर अनियमित बस्तियां बनाकर रहने को मजबूर हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में ऐसी अनियमित बस्तियों की संख्या क़रीब 700 है. दिल्ली, कर्नाटक और गुजरात जैसे कुछ राज्य कुष्ठ से निजात पा चुके हैं और वहां आंशिक तौर पर पीड़ित लोगों के लिए रोज़गार संबंधी नीतियां भी बनाई गई हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर कुष्ठ रोगियों के पुर्नवास के लिए अभी तक कोई नीति नहीं बन सकी. सवाल यह है कि अगर सरकार ही इन कुष्ठ रोगियों की अनदेखी करेगी तो आम लोग समाज के इस तबके की मदद करने के लिए आगे कैसे आएंगे.
आंकड़ों में कुष्ठ रोगी

वैश्विक स्तर पर भारत में कुष्ठ रोगियों की संख्या सबसे अधिक है. साल 2008 में जारी एक रिपोर्ट की मानें तो पूरे विश्व में ढाई लाख कुष्ठ रोगी थे, जिसमें केवल भारत से 1 लाख 37 हज़ार कुष्ठ रोगी शामिल थे. डब्ल्यूएचओ द्वारा हाल में लगाए गए एक अनुमान के मुताबिक़, भारत में कुष्ठ रोगियों की संख्या में क़रीब 35 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. इनमें महिलाओं की संख्या क़रीब 48 हज़ार बताई गई है. वहीं तक़रीबन 14 हज़ार बच्चे भी इस रोग से ग्रस्त हैं. भारत में क़रीब सात सौ कुष्ठ आश्रम हैं. कुष्ठ रोग का इलाज भी है, लेकिन निजात पाने के बाद फिर से इसकी चपेट में आने की शिक़ायतें आम हैं. क़रीब 325 कुष्ठ रोगी ठीक होने के बाद फिर से इसकी चपेट में आ चुके हैं.
कुष्ठ रोग के कारण


कुष्ठ रोग वंशानुगत नहीं, बल्कि एक संक्रामक रोग है, जो दूसरे संक्रामक रोगों की तरह एक जीवाणु माइक्रोबैक्टेरियम लेप्री की वजह से फैलता है. यह खासकर त्वचा, पेरिफेरल नर्व्स, श्वांस और आंखों को प्रभावित करता है. प्रारंभिक स्तर पर इसका इलाज आसानी से हो जाता है, लेकिन देर हो जाने के बाद यह जीवाणु पीड़ित व्यक्ति के शरीर में कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न करना शुरू कर देता है. सही समय पर इसका इलाज न हो तो पीड़ित मनुष्य असमर्थ भी हो सकता है. इस रोग का ख़तरा वयस्कों की अपेक्षा बच्चों में अधिक होता है. इसीलिए बच्चों को खासकर कुष्ठ रोगियों से परहेज़ करने के लिए कहा जाता है. यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है और पांच साल तक शरीर में फैलती रहती है. इसके लक्षण उभरने में 20 साल तक लग सकते हैं. ऐसे में सावधानी और सही समय पर इलाज ही एकमात्र उपाय है.

कुमार सुशांत- कुष्ठ रोगी : कोई हमारी भी सुनो कुमार सुशांत- कुष्ठ रोगी : कोई हमारी भी सुनो Reviewed by kumar sushant on 8:52 PM Rating: 5

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