कुमार सुशांतः अब लोकतंत्र नहीं घर का राशन देखिए साहब !
कुमार सुशांतः
मैंने हाल ही में प्रवक्ता डॉट कॉम के लिए एक स्टोरी लिखी थी- ‘आप की सरकार, आगाज नहीं अंजाम सोचिए’। सोचा था कि अंजाम निकले तो कुछ लिखूं, लेकिन कुछ दिनों से खुद को रोकते-रोकते अब रहा नहीं गया। हर तंत्र अपने-अपने फायदे की बातें कर रहा है। मीडिया अपना फर्ज निभा रहा है। उसे रोचकदार खबरें चाहिए, नहीं तो इनपुट-आउटपुट हेड से लेकर बुलेटिन प्रोड्यूसर से लेकर असिस्टेंट प्रोड्यूसर तक को जम्हाई आने लगती है। नेता अपना काम कर रहा है। कल तक तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोगों से इस धरना में न आने की अपील कर रहे थे, वहीं थोड़ी देर बाद से जो दिल्ली में मोबाइल मैसेजेज भेजकर लोगों को धरना-स्थल पर बुलाने का सिलसिला चालू हुआ, वह बीती रात तक चलता रहा। मैं बीती रात टीवी न्यूज चैनल्स देख रहा था। बड़े-बड़े दिग्गज (जिनको भाषायी और अनुभव तौर पर आदर्श मानता हूं) केजरीवाल तक पहुंचने और पूरी परिस्थिति को दिखाने की जुगत में लगे थे। जो-जो टीआरपी के लिए नुस्खे थे, सारे प्रयोग किए जा रहे थे। सुबह होते ही भाजपा के कार्यालय में लोगों की भीड़ जुटाने की प्लानिंग होने लगी और अंततः विजय गोयल के नेतृत्व में सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया गया। उधर कांग्रेस की ओर से महिला कांग्रेस ने अपने ही साथी (सरकार में) केजरीवाल का कल विरोध प्रदर्शन किया। कांग्रेस के खेमे से अरविंदर सिंह लवली समेत अन्य अलग से ताल ठोंक रहे हैं। इन नेताओं में कौन अच्छा है, कौन बुरा, इसकी छोड़िए। सबसे पहले यह सोचिए कि मीडिया, नेता व चापलूस तंत्र तो अपना काम कर रहा है, केवल एक युवा हैं, कुछ बुजुर्ग हैं जो निठल्लों की तरह इनके रैलियों में सुबह से भूखे-प्यासे जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते पहुंच जाते हैं।
मैंने हाल ही में प्रवक्ता डॉट कॉम के लिए एक स्टोरी लिखी थी- ‘आप की सरकार, आगाज नहीं अंजाम सोचिए’। सोचा था कि अंजाम निकले तो कुछ लिखूं, लेकिन कुछ दिनों से खुद को रोकते-रोकते अब रहा नहीं गया। हर तंत्र अपने-अपने फायदे की बातें कर रहा है। मीडिया अपना फर्ज निभा रहा है। उसे रोचकदार खबरें चाहिए, नहीं तो इनपुट-आउटपुट हेड से लेकर बुलेटिन प्रोड्यूसर से लेकर असिस्टेंट प्रोड्यूसर तक को जम्हाई आने लगती है। नेता अपना काम कर रहा है। कल तक तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोगों से इस धरना में न आने की अपील कर रहे थे, वहीं थोड़ी देर बाद से जो दिल्ली में मोबाइल मैसेजेज भेजकर लोगों को धरना-स्थल पर बुलाने का सिलसिला चालू हुआ, वह बीती रात तक चलता रहा। मैं बीती रात टीवी न्यूज चैनल्स देख रहा था। बड़े-बड़े दिग्गज (जिनको भाषायी और अनुभव तौर पर आदर्श मानता हूं) केजरीवाल तक पहुंचने और पूरी परिस्थिति को दिखाने की जुगत में लगे थे। जो-जो टीआरपी के लिए नुस्खे थे, सारे प्रयोग किए जा रहे थे। सुबह होते ही भाजपा के कार्यालय में लोगों की भीड़ जुटाने की प्लानिंग होने लगी और अंततः विजय गोयल के नेतृत्व में सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया गया। उधर कांग्रेस की ओर से महिला कांग्रेस ने अपने ही साथी (सरकार में) केजरीवाल का कल विरोध प्रदर्शन किया। कांग्रेस के खेमे से अरविंदर सिंह लवली समेत अन्य अलग से ताल ठोंक रहे हैं। इन नेताओं में कौन अच्छा है, कौन बुरा, इसकी छोड़िए। सबसे पहले यह सोचिए कि मीडिया, नेता व चापलूस तंत्र तो अपना काम कर रहा है, केवल एक युवा हैं, कुछ बुजुर्ग हैं जो निठल्लों की तरह इनके रैलियों में सुबह से भूखे-प्यासे जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते पहुंच जाते हैं।
मैंने सुबह-सुबह एक ऑटो वाले से पूछा कि भैया आप
उस धरना व प्रदर्शन में किसी पार्टी की तरफ से नहीं गए तो उसने भावनात्मक जवाब
दिया। कहा कि उसके तीन बच्चे हैं, परिवार की जिम्मेदारी है, घर सही से चल नहीं पा
रहा, तो क्या धरना और कैसा प्रदर्शन, बल्कि इन सबके चक्कर में हड़ताल हो जाए तो उस
दिन उसके घर का चूल्हा कैसे चले, इस पर संकट आ जाता है। जरा सोचिए, यहां समझने की
कोशिश कीजिए। हर तंत्र अपना काम कर रहा है। मैं लेख भी लिख रहा हूं तो अपना काम कर
रहा हूं। यह हर पत्रकार का पेशा है, जिसके बदले उसे पैसे मिलते हैं। वैसे ही टीवी
या अखबार वाले संपादक हों या बड़े पत्रकार, भले ही लाख नीतिगत बातें करें, एक
महीने की समय पर सेलरी न मिले तो नौकरी बदल लेंगे। वहीं दूसरी ओर नेता आपकी (जनता
की) मदद से बैतरनी पार कर जाते हैं। नेताओं और उनके चापलूसों का तो यही रोजगार ही
है। उनका पेशा ही यही होता है। अब लोकतंत्र के महापर्व कहे जाने वाले चुनाव से दो
महीने आप (जनता) अपने पसंदीदा उम्मीदवार के लिए गुटबाजी कर दिए, सरकार बनवा दिए,
अब सरकार अपना काम करे, जनता को तो यह संदेश देना चाहिए। निठल्लों की तरह अगर
केजरीवाल के साथ धरने पर बैठ जाएंगे तो यह सोचिए कि आपका घर कैसे चलेगा और अगर
युवा हैं तो सोचिए कि आने वाला आपका भविष्य कैसे चलेगा? ये
तो नेता हैं, नेतागिरी चलती रहे, सत्ता मिलती रहे, मलाई खाते रहें, कुछ न कुछ करते
रहेंगे। जब टेंडर देने की बारी आएगी तो अपने शागिर्दों और चापलूसों को ही देंगे,
उस समय जनता को तो मिलने भी नहीं देंगे। फायदा पहुंचाने की बारी आएगी तो उन्हें
देंगे जो 5-10 लोग इनकी पार्टी के लिए जान देते फिरते हैं। आपको (जनता को) क्या
मिलेगा। ठेंगा ? यह बात चुभने वाली है, चुभेगी।
दिल्ली सरकार को बने 22 दिन हुए हैं। यह समझिए कि
22 दिन में आपने कितने रूप देखे। शायद बहुरुपियों से भी अधिक रूप। जो कांग्रेस
बिना शर्त समथर्न दे रही है, जिसकी बैसाखी लिए दिल्ली की लंगड़ी सरकार खड़ी है, वो
कांग्रेस एक तो ऐसी सरकार को थामे है और दूसरी तरफ कहती है कि यह सरकार गलत कर रही
है। अरे भाई, अगर यह सरकार गलत कर रही है तो खींच लो न समर्थन। वह तो आपलोग करोगे
नहीं। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी ने कुछ सोच कर रखा होगा, जिसके लिए न सरकार
गिराकर भौं-भौं कर रहे हो। और उसका साथ दे रहे हैं दिल्ली के कुछ लोग। उधर दिल्ली
के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं कि हमें कांग्रेस काम करने नहीं देती।
केंद्रीय गृह मंत्री सुशील शिंदे को मैं चैन से सोने नहीं दूंगा। अरे भाई, किस
कांग्रेस के खिलाफ हल्ला बोल रहे हो, वह जो तुम्हारे सरकार बनाने में मित्रता की
भूमिका में है। और तो और उसी कांग्रेस के संदीप दीक्षित से दोस्ती निभाने के लिए
आपने दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमति शीला दीक्षित को हर जांच कटघरे से बाहर कर
दिया। चुनाव से पहले तो अरविंद बाबू बहुत हल्ला मचा रहे थे। यह कर दूंगा, वह कर
दूंगा। ये जांच बिठाउंगा, वो जांच बिठाउंगा। अब क्या हुआ। और अरविंद के इस मनोबल
को बढ़ा रहे हैं दिल्ली की जनता। जनता बेवकूफ। वहीं भाजपा वाले भी लोगों की
टोलियां लेकर पहुंच रहे हैं केजरीवाल का विरोध करने। यह जानते हुए कि भाजपा ने 32
सीट लाकर दिल्ली की सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी सरकार बनाने की जरा भी पहल नहीं की,
क्योंकि उन्हें केजरीवाल की अनुभवहीनता को सामने जो लाना था। और इन सब के बीच में
मीडिया वाले, जो जितने अच्छे वक्ता, लिखाड़, उतनी अच्छी सेलरी वाले। वो अपनी
रौशनाई और लच्छेदार भाषणों से चाहें तो किसी को भी बढ़िया कह दें और शाम में उसकी
कमीज उतार दें, क्योंकि इसी बात के तो उन्हें पैसे मिलते हैं। लेकिन इन सबके बीच
में पिस रही है दिल्ली की जनता जो सुबह से अपने काम-धाम को छोड़ इनके पीछे
जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगा रही होती है। इन्हें ये नेता लोकतंत्र और देश
बदलने की दुहाई जैसे ही देते हैं, इन्हें लगता है कि पता नहीं क्या कर दें। किस
पत्थर से जाकर सिर भिड़ा दें। बेवकूफियत छोड़िए, पूरा देश महंगाई की जद में है। ये
नेता तो अपने यहां फ्री में 20-30 सिलेंडर एक फोन पर मंगवा लेंगे। फ्री फोन कॉल्स
हैं। घर है। गाड़ी है। आप (जनता) सोचिए। सुबह से जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाने
के बाद आपको क्या हासिल होता है। आप (जनता) सोच रहे होंगे, सिस्टम सुधरेगा।
मित्रों, ऐसे सिस्टम नहीं सुधरता है। सिस्टम सिस्टमेटिली सुधरता है। एक रात में
कुछ नहीं होता। आपने नेता चुन दिया, सरकार बनवा दी। अब अपने घर के राशन की फिक्र
कीजिए। केजरी बाबू आपको आलू-प्याज-आटा-सिलेंडर देने आएंगे नहीं। सुधर जाइए।
कुमार सुशांत
कुमार सुशांत
कुमार सुशांतः अब लोकतंत्र नहीं घर का राशन देखिए साहब !
Reviewed by kumar sushant
on
3:39 AM
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