मधुबनी पेंटिंगः सुशासन और बेहाल कला
मधुबनी पेंटिंग्स पूरी दुनिया में मशहूर हैं. ब्रिटेन, जापान एवं अमेरिका जैसे देशों में ख़ास तौर पर इसके संग्रहालय हैं और बाज़ार भी, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि जिस क्षेत्र से इसका वजूद है, वहां न तो इसका बाज़ार है और न ही किसी को कोई सरकारी सहायता मिलती है. कलाकारों का कहना है कि उन्हें नीतीश कुमार के सुशासन पर भरोसा था, लेकिन उन्होंने भी उनका भरोसा तोड़ दिया.
मधुबनी में पेंटिंग कला की यह परंपरा सात शताब्दी ईसा पूर्व से भी पुरानी है. सबसे पहले क्षेत्र के लोग दीवारों पर चित्रकारी करते थे. इसके साथ ही शादी एवं व्रत-त्योहार के मौक़ों पर भी चित्रकारी की जाती थी, लेकिन पिछले कुछ दशकों से बैग एवं कपड़ों पर भी पेंटिंग होने लगी है. कलाकारों के हाथों में कला तो है, पर उन्हें कहीं से कोई सहयोग नहीं मिलता. कलाकार शोभा देवी कहती हैं कि उनका परिवार सालों से इस व्यवसाय से जुड़ा है. उन्हें एक पेंटिंग बनाने में तीन-चार दिन लग जाते हैं. वह बताती हैं कि परिवार की रोजी-रोटी इसी कला पर टिकी है. वह बात करते-करते मायूस हो जाती हैं, कहती हैं कि इतनी मेहनत से अपने काम को अंजाम देने के बावजूद उन्हें पर्याप्त मेहनताना नहीं मिल पाता. शोभा के अनुसार, इलाक़े के व्यवसायी उनकी एक पेंटिंग 150-200 रुपये में ख़रीदते हैं और उसे बिचौलियों के माध्यम से विदेशों में महंगे दामों पर बेच दिया जाता है. शुरू में इस कला में ज़्यादातर महिलाएं दिलचस्पी लेती थीं, लेकिन समय बदला, मधुबनी पेंटिंग पूरी दुनिया में मशहूर हो गई. देखते ही देखते इसने व्यवसाय का रूप ले लिया और अब बड़ी संख्या में पुरुष भी इस कला में पारंगत हो गए हैं. मधुबनी के जीतवारपुर, रशीदपुर, राजनगढ़, मंगरौनी, सिमड़ी एवं चिचरी आदि इलाक़ों के ज़्यादातर लोग पेंटिंग्स बनाने के काम में लगे हैं. आंकड़ों के मुताबिक़, दरभंगा ज़िले के तकरीबन 25,000 से अधिक परिवार पेंटिंग्स व्यवसाय से संबद्ध हैं. मधुबनी और आसपास के क्षेत्र में कौन सांसद-विधायक बनेगा, यह ़फैसला बहुत कुछ इन्हीं कलाकारों के मतों पर निर्भर करता है.वर्ष 2005 में राज्य में चली परिवर्तन की लहर के दौरान यहां की जनता ने ज़्यादातर एनडीए उम्मीदवारों पर भरोसा किया. इसी का नतीजा है कि मधुबनी संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 10 विधानसभा सीटों में से 7 पर एनडीए उम्मीदवार विजयी हुए.
चुनाव के मौसम में यहां के कलाकारों की समस्याओं और उनकी रोजी-रोटी के संबंध में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने अनगिनत वादे किए, लेकिन उन पर आज तक अमल नहीं हो सका है. ख़ुद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कई मौक़ों पर मधुबनी पेंटिंग की तारीफ कर चुके हैं, लेकिन उनकी ओर से भी कलाकारों को स़िर्फ उपेक्षा ही हाथ लगी. कारीगर राजेंद्र कहते हैं कि हम लोगों को नीतीश सरकार से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. राजेंद्र बताते हैं कि राज्य सरकार ने कई बार घोषणा की कि हर कलाकार अपने रोज़गार को आगे बढ़ा सके, इसके लिए उसे बैंकों से 40,000 रुपये तक क़र्ज़ मिलेगा, लेकिन क़र्ज मिलने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इस योजना से पैसे या पहुंच वाले कलाकार ही लाभान्वित होते हैं. नीतीश सरकार स्वयंसेवी संस्था जीविका के माध्यम से स्वयं सहायता समूह बनाकर कलाकारों की स्थिति सुधारने की घोषणा कई बार कर चुकी है, लेकिन उसके कार्यकाल का साढ़े चार साल बीतने के बावजूद कोई भी घोषणा मूर्त रूप नहीं ले सकी.
मधुबनी पेंटिंग के नमूने को ग्लोबल इंडिकेशंस एक्ट फॉर पेंटिंग के तहत पंजीकृत किया गया है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मशहूर होने के बावजूद राज्य सरकार की लापरवाही के चलते इसे औद्योगिक मान्यता नहीं मिल सकी. ब्रिटेन एवं जापान में मधुबनी पेंटिंग्स का बहुत बड़ा बाज़ार है, जहां विदेशी इन्हें बड़े शौक से ख़रीदते हैं. अमेरिका में भी इसका बहुत बड़ा संग्रहालय बनने जा रहा है, लेकिन जहां इस कला का जन्म हुआ, जहां इसका वजूद है, वहां न तो इसका बाज़ार है, न कोई कीमत. इसके लिए दोषी केवल राज्य सरकार नहीं, केंद्र सरकार भी है. इसी का नतीजा है कि भारत सरकार के हस्तशिल्प विभाग जिसके 18 ज़िलों का कार्यालय मधुबनी में है, यह कार्यालय अस्तित्वहीन हो चुका है. हालात यह है कि विभाग को न तो फंड मिलता है, न कोई सहयोग. पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री डॉ. शकील अहमद जब मधुबनी के सांसद थे तो उन्होंने भी घोषणा की कि 10,00,000 रुपये की योजना से संग्रहालय बनाया जाएगा, जिससे दूसरे देशों की तरह यहां भी इन कलाकारों को बाज़ार मिल सकेगा, लेकिन शकील अहमद की घोषणा चुनावी दौर में था. शकील अहमद संसदीय चुनाव हार गए. घोषणा भी ख़त्म हो गया.
यहां के कलाकारों को उनके बेहतर कलाकारी के लिए पुरस्कारों से नवाज़ा भी जाता है. सम्मान प्राप्त करने की प्रक्रिया भी अलग है. सबसे पहले ज़िला उद्योग के माध्यम से चित्रकारी का चयन कर पटना भेजा जाता है. पटना से इसका चयन कर दिल्ली कलाकृति के पास उन पेंटिग्स को भेजा जाता है. जहां एक्सपट्र्स पेंटिग्स का चयन कर पुरस्कार की घोषणा करते हैं. लेकिन सवाल है कि हज़ारों परिवार में से एक दो सम्मान देकर बाकि हज़ारों के पेट की आग शांत हो सकती है? एक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करता है. लेकिन जब कलाकार की कला उसकी जीविका बन जाए, तो कला के प्रति उसकी उम्मीदें बढ़ जाती हैं. यहां भी कलाकार हर 5 साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उम्मीद लगाकर अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं. लेकिन जब हर बार कलाकार को निराशा हाथ लगती है, तो कलाकार की कला भी प्रभावित होती है. सवाल नीतीश सरकार से है कि क्या इनके हर साल पेश होने वाले विकास रिपोर्ट कार्ड में कभी इन कलाकारों की कला का विकास होना शामिल नहीं हुआ?
http://www.chauthiduniya.com/2010/08/madubani-penting-sushasan-our-behal-kala.html
मधुबनी पेंटिंगः सुशासन और बेहाल कला
Reviewed by kumar sushant
on
9:59 PM
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