कुमार सुशांतः गया का अगरबत्ती उद्योगः बेहाल कारीगर, उदासीन सरकार
बिहार के गया ज़िले का अगरबत्ती उद्योग पूरे देश में प्रसिद्ध है. गया प्रमंडल में हज़ारों लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं और वे हर साल क़रीब दस करोड़ रुपये से ज़्यादा का कारोबार करते हैं, लेकिन अ़फसोस की बात यह है कि राज्य सरकार से उन्हें कोई सहायता-सुविधा नहीं मिलती. पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान कारीगरों से ढेरों वादे किए गए, लेकिन कोई भी वादा आज तक पूरा नहीं हुआ. आख़िर कब सुधरेगी इन कारीगरों की हालत?करीमगंज इलाक़े में अगरबत्ती बनाने वाली महिला कारीगर सुशीला बताती हैं कि बिचौलिए उन्हें बांस की तीली, मसाले एवं सुगंधित द्रव्य उपलब्ध कराते हैं. क्षेत्र के जंगल उजड़ जाने के कारण बिचौलिए यह सारा सामान कोलकाता, दिल्ली एवं अन्य बड़े-बड़े शहरों से मंगवाते हैं. ऑर्डर के हिसाब से ही कारीगर अगरबत्तियां तैयार करते हैं. सुशीला के मुताबिक़, बिचौलिए महंगाई की दलील देते हुए कम मेहनताना देते हैं, जबकि उन्हें पर्याप्त मुना़फा होता है. इलाक़े में स्वयं सहायता समूह के अंतर्गत कई सरकारी योजनाएं भी चलाई जाती हैं, लेकिन उन योजनाओं की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इसका लाभ उन्हीं कारीगरों को मिलता है, जिनके पास स़िफारिश है या जो आर्थिक मामलों में मजबूत हैं. साफ तौर पर उन सारी योजनाओं का लाभ बिचौलियों को ही मिलता रहा है. नतीजतन, अगरबत्ती तैयार करने वाले कारीगरों की हालत दिनोंदिन कमज़ोर होती जा रही है. इनकी हालत सुधारने के लिए किसी ने अब तक कोई ठोस पहल नहीं की. कारीगरों को नीतीश कुमार पर भरोसा था, लेकिन उन्होंने भी निराश ही किया. कारीगरों का कहना है कि उनकी कला को अगर सराहा जाता तो वे इसे एक नया आयाम दे सकते थे. कई कारीगरों ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2005 के विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक कई बार उनकी स्थिति सुधारने का वादा किया, पर हक़ीक़त में आज तक कुछ भी नहीं हुआ.
पिंडदान के लिए मशहूर गया में 25 से 30 हज़ार कारीगर अगरबत्ती बनाने के काम में लगे हैं. हमारा देश जहां हर साल 220 करोड़ रुपये की अगरबत्ती का निर्यात करता है, वहीं केवल गया के कारीगर 10 करोड़ रुपये से ज़्यादा का कारोबार करते हैं. सवाल उठता है कि ऐसे में क्या नीतीश सरकार को राज्य में इस उद्योग के विकास के लिए कदम नहीं उठाना चाहिए था? लेकिन सच्चाई यह है कि सुशासन में भी उक्त कारीगर अपनी बदहाली पर रो रहे हैं.गया प्रमंडल अंतर्गत पांच लोकसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें गया, जहानाबाद, नवादा, अरवल और औरंगाबाद शामिल हैं. इन लोकसभा क्षेत्रों में अगरबत्ती बनाने वाले अधिकांश कारीगर मुस्लिम एवं दलित हैं. गया में सबसे अधिक महिलाएं इस व्यवसाय से जुड़ी हैं. इसके अलावा नवादा और अरवल में ऐसे सैकड़ों कारीगर हैं, जिनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया अगरबत्ती उद्योग है. गया प्रमंडल में 26 विधानसभा क्षेत्र एवं गया लोकसभा क्षेत्र अंतर्गत 10 विधानसभा क्षेत्र आते हैं. गया के इन दस विधानसभा क्षेत्रों में राजद के चार, जदयू के तीन और भाजपा, कांग्रेस एवं लोजपा के एक-एक प्रत्याशी 2005 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर चुके हैं. वर्तमान में हरि मांझी गया लोकसभा क्षेत्र से सांसद हैं. गया में अगरबत्ती बनाने वाले कारीगरों की संख्या क़रीब 25 से 30 हज़ार है. कारीगरों की इस संख्या से एक बात तो साफ है कि गया से चुने जाने वाले प्रत्याशियों की जीत का फैसला बहुत कुछ इन कारीगरों के मतों पर भी निर्भर करता है. राज्य विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही यहां संभावित उम्मीदवारों एवं विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं का आना-जाना शुरू हो गया है. विपक्षी पार्टियों के विधायक यह दलील देकर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं कि प्रदेश सरकार ने उन्हें कई मामलों में मदद नहीं की, लेकिन इस बार अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो वे हर शिक़ायत दूर करेंगे. वहीं दूसरी ओर जदयू-भाजपा के उम्मीदवार नीतीश सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं, मगर अगरबत्ती कारीगरों के विकास के सवाल पर उनके मुंह बंद हो जाते हैं. कारीगर बेख़ौ़फ कहते हैं कि उनकी बदहाली के लिए केवल सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक ही नहीं, बल्कि गया के भाजपा सांसद हरि मांझी भी जिम्मेदार हैं. राज्य के पूर्व परिवहन मंत्री एवं वर्तमान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव डॉ. शकील अंसारी का कहना है कि गया में असंगठित तौर पर हज़ारों कामगार इस व्यवसाय से जुड़े हैं, जिनकी स्थिति राज्य सरकार सुधार सकती थी, लेकिन कामगारों की हालत सुधारने और विस्तृत तौर पर इस उद्योग को चलाने के लिए नीतीश सरकार ने ऐसी किसी योजना पर कभी ग़ौर ही नहीं किया. ऐसा नहीं है कि गया प्रमंडल अंतर्गत केवल अगरबत्ती उद्योग से जुड़े कारीगरों की ही हालत दयनीय है. नीतीश सरकार के कार्यकाल में कई बंद उद्योग खुल तो नहीं पाए, उल्टे कई अन्य उद्योग बंद ज़रूर हो गए. गया की बुरारु चीनी मिल और नवादा की वारिसलीगंज चीनी मिल राज्य की जदयू-भाजपा सरकार नहीं खुलवा सकी. गया की जूट एवं कॉटन मिल एक ज़माने में काफी मशहूर थी, लेकिन बंद पड़ी इस मिल की हालत इस क़दर ख़राब हुई कि इसकी ज़मीन तक बिक गई. गया प्रमंडल अंतर्गत इन इलाक़ों में मिलों के दम तोड़ने से हज़ारों लोग बेरोज़गार हो गए. नीतीश सरकार पलायन रोकने और रोज़गार के अवसर बढ़ाने के वादे करती रही और मिलें बंद होने के कारण नए रोज़गार की तलाश में हज़ारों लोग भटकते रहे. अगरबत्ती बनाकर दूसरों के घरों में खुशबू फैलाने वाले इन कारीगरों के जीवन में दु:ख और परेशानियों का कोई अंत नहीं दिखता. चुनाव सिर पर हैं. एक बार फिर विभिन्न दलों के नेता इन कारीगरों की हालत सुधारने के वादे और अपने पक्ष में मतदान की अपील कर रहे हैं. कारीगर कहते हैं कि वे आख़िर करें भी तो क्या? चुनाव इन्हीं लोगों के बीच से ही करना है, लेकिन जो भी सरकार बनेगी, हमारी उम्मीद उससे जुड़ी रहेगी.
आंकड़ों में भारत
अगरबत्ती को इंसेस स्टिक्स भी कहा जाता है. यह बांस की तीली, सुगंधित पौधोंसे प्राप्त तेल एवं सुगंधित पाउडर आदि के मिश्रण से तैयार की जाती है. इसमें प्रयुक्त होने वाली तमाम चीजों का स्रोत जंगल हैं, जहां से बांस और अन्य सुगंधित पदार्थ प्राप्त किए जाते हैं. एक आंकड़े के मुताबिक़, देश में छोटे-बड़े मिलाकर अगरबत्ती तैयार करने वाली क़रीब दस हज़ार से ज़्यादा यूनिट्स हैं. हमारे देश में हर साल एक हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की मार्केटिंग की जाती है. यही नहीं, हर साल क़रीब 60 बिलियन स्टिक्स तैयार की जाती हैं और इसमें हर साल सात फीसदी की बढ़ोत्तरी होती है. एक सर्वेक्षण के अनुसार, अगरबत्ती बनाने के व्यवसाय में हमारे देश के क़रीब 12 लाख से अधिक लोग जुड़े हैं. पारंपरिक और धार्मिक नज़रिए से भारत दुनिया में अगरबत्ती उद्योग के लिए प्रसिद्ध है. पूरी दुनिया में अगरबत्ती का सबसे बड़ा बाज़ार भारत में ही है. यहां ग्रामीण इलाक़ों एवं महानगरों में बड़े पैमाने पर अगरबत्ती बेची और इस्तेमाल की जाती है. विश्व स्तर पर भी आधे से अधिक अगरबत्ती का निर्यात भारत से ही होता है. एक आंकड़े के अनुसार, भारत से तक़रीबन 220 करोड़ स्टिक्स का निर्यात हर साल होता है. आज अगरबत्ती उद्योग सरकार के लिए न केवल राजस्व अर्जन का प्रमुख ज़रिया बन गया है, बल्कि ग्रामीण इलाक़ों में महिलाओं के रोज़गार का मुख्य स्रोत भी है. वर्तमान में भारत में अगरबत्ती उद्योग एक कुटीर उद्योग बन गया है, लेकिन इसका बाज़ार बड़े पैमाने पर अनियोजित है. इस उद्योग का केवल 20 फीसदी हिस्सा ही नियोजित है, बाक़ी छोटे संचालकों द्वारा नियंत्रित किया जाता है. अगर इस उद्योग का विस्तृत पैमाने पर विकास करना है तो सरकार को अविलंब इस ओर ध्यान देना होगा.
कुमार सुशांतः गया का अगरबत्ती उद्योगः बेहाल कारीगर, उदासीन सरकार
Reviewed by kumar sushant
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8:59 PM
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