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ये ब्लॉग कुमार सुशांत के लेख पर आधारित है।

कुमार सुशांतः पत्रकारिता पर कटु-सत्य कविता

कुमार सुशांतः 

खबर को खबर ही रहने दीजिए न तेल-मिर्च लगाइए
ये लोग समझ लेते हैं, न बेवकूफ बनाइए
सुना है इस शहर का अखबार बिक चुका है
किसकी कागज है, किसकी रौशनाई है, जरा पता तो लगाइए
गांव से गुजरते उस बुजुर्ग पर नजर गई
कहा मामला तो और था छपा अलग, कोई तो बताइए
सुबह की खबर ही बड़ी विचित्र थी
पत्रकार ने रिश्वत लिए थे, पूछने पर कहा कानून न समझाइए
कल तक सच का गीत गाने वाले पलट गए
शायद सत्ता पलटी है, कहा पुरानी भूल माफ, अब विज्ञापन दिलवाइए
एक मंत्री की सिफारिश पर तो अखबार ही बदल दी
कहा सीखिए पत्रकारिता, पहले दुकान तो चलवाइए
जो देखना है हकीकत तो चलिए नवाबों के शहर
सड़क छाप भी कहते हैं आग लगा दूंगा, संपादक तो बनवाइए
उस भेड़ की फौज में शेर भी शामिल थे
पर वो कहते थे नौकरी करनी है सिफारिश तो करवाइए
करोड़पति बने कि मीडिया की दुकान खोल लेते हैं
पत्रकार पहुंचे इंटरव्यू देने, कहा पगार दीजिए चाहे जो लिखवाइए
यहां हर शख्स को है पत्रकार कहलाने की जल्दी
कुर्सी खींच बैठ जाएंगे, कहेगा मीडिया से हूं, इज्जत तो करवाइए
अनुशासन और ज्ञान की बातों को ठेंगा
दिन में नीतिगत रईसजादे, रात होते कहेंगे, एक पैग और लगवाइए
है वो उतना बड़ा पत्रकार यहां जो जितना बड़ा दलाल है
आपमें भी है दम तो इस रस्म का एक हिस्सा बन जाइए
कुमार सुशांतः पत्रकारिता पर कटु-सत्य कविता कुमार सुशांतः पत्रकारिता पर कटु-सत्य कविता Reviewed by kumar sushant on 2:47 AM Rating: 5

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